Sunday, March 28, 2010

कई बार मेरे इस दिल को छुआ........

दिल के झरोखे में झांका जब
एक बार नहीं कई बार हुआ
मासूम अदा तेरी बातो ने
कई बार मेरे इस दिल को छुआ........

मधुमास महकती रातो में
संपुट हिय मन जलता ही रहा
जब जानहु जिउ ,जिउ से जुड़ता
मन सहज हुआ दुइ पलता रहा
अवसाद घिरे काले बादल
क्षण-क्षण में झनक गई उनकी दुआ
कई बार मेरे इस दिल को छुआ.........

मत नीरस है जग प्यार भरा
फुल्ल शतदल से आकाश भरा
सोचा मन प्रिये तुम आ जाओ
अंतस्थल में तुम छा जाओ
अवसाद मुखर आंसू बहते
तम निर्झर में कोई स्वपन खुआ
कई बार मेरे इस दिल को छुआ....
............. मुकन्दा

पेड़ और इंसान ......

चक्रवात के एक झंजावत ने
किनारों कों मिटाने का जब नाम लिया
काले समुद्र ने कै की थी
बर्बर समुद्र-तट से.
सुन्दर हरित मैदान के ऊपर
काली लाल आँखों वाला वो पिचाश
घूरने लगा पेडो कों,
इंसानों कों..
पेड़ गिरने लगे थे,
इंसान मरने लगे थे.
पेड़ गिर गए,
इंसान मर गए..
पेड़ों के भव्य तने
तूफ़ान से ध्वस्त हो गए,
इंसानों के हौसले प्रस्त हों गए..
इंसान और पेड़ दोनों निर्जीव हो गए..
पेड़ हे पेड़ ,हे इंसान
क्या तुम मर सकते हो?
सुर्ख़ नदियों ने पूछा.
प्यारे पेड़ और जद्दोजहद भरे इंसान,
तुम्हारी जड़ें लबालब भरी हुई हैं,
युवा अवयवों से तैयार गहरे हौसले से..
प्यारे पेड़ और धरती के दुलारे इंसान,
तुम दोनों की की जड़ें कभी नहीं सूखतीं..
क्यू की तुम दोनों ही साँसों से जीते हों,
तुम्हारी जड़ें फैलती हैं नितल गहराइयों में,
चट्टानों के पार तक धरती के भीतर,
अपना रास्ता ढूंढती हुईं
मुकाम तलाशती हुई
तुम्हारी जड़ें कभी नहीं सूख पायेगी ....

अन्तरात्मा का गणतत्र...........




अपनी अन्तरात्मा की
ठण्डक और
अनम्य इन्कार के बग़ैर
असम्भव है
वैभव और गरमाहट गणतत्र की

जिन हाथो से निकलता है
कुहरा दुर्घटनाओं का
लघु और दीर्घ-शंकाओं के
भीतर तक
उन्ही तूफानी हाथो में
डौर है प्रजातंत्र की

सोते हुए सभी चेहरे
लगते हैं निश्छल
जकड़ लेते जबड़े
हर सांस को
और जगते हुए चेहरों से
भयभीत है आत्मा प्रजातंत्र की

गुण-दुर्गुण लोगों के
हाथो से तपती है धरती
अमानवीय जीवन से
जन्मजात गुण-अवगुण के
इस भयातुर दौर में
कैसे बधाई दे गणतंत्र की
या तू कहे कि या मै सुनु,
कि या मन स्वपन बुनू.,
भीतर .मन अवसाद है दुनिया
कैसे स्वपन चुनु ....
..................मुकन्दा

एक गन्ध

जून के महीने सी भटकती हवा
रोज मेरे ह्रदय को जलाती है
जो आंच चूल्हे में होनी थी
वो ही आंच
चूल्हे की बुझती राख को कुरेदती है
उधार की अधपकी रोटी
उस आंच को ढून्दती है
एक ग्रास तोड़ती है
और घुटनों पे हाथ रखके
राख में आंच को मौड़ती है

पंजाब के पीले गेहू और
बिहार के ज़र्द होंटों के छाले
आज बिलखकर
आंच को आवाज़ देते हैं
आंच हर गले स्याह दर्द देती हुई
चीख मारकर
बंगाल की खाड़ी में गिरती है ...

कब्रिस्तान से
एक गन्ध-सी आती
और श्मशान पार बैठे
श्मशान-घरों के वारिस
आंच की इस गन्ध को
साँस की गन्ध में भिगो कर पीते है ...

चूल्हे की आंच धीरे धीरे
ह्रदय में उतरने लगती है
और चूल्हे के दूसरे वारिस
भूख के धुवे में
तक़दीर की गन्ध ढून्दते है
और आंच का वो धुँआ
मंदिर के आहाते जाकर
विलीन हो जाता है
मंदिर की छोटी दिवार
और मोटी हो जाती है
पुजारी का पेट उस गंध से
तृप्त होकर
गंध और आंच में अंतर ढून्डने लगता है .....

जब जवानी जागे .सपनों से आगे .........

आँखों में
मासूक का सपना ,
आशिक है
जो अपना ,
ये ख़ाक भी सबा गुल जवानी .....
अहद आगे,
सिहरन सी जागे ,
हुस्न शोला है
मयखाने बयानी ,,,,
,,,,,......मुकन्दा
खोलू सखी री पट घुघंट के ,
आयो सखी जबहू श्याम हमारो ,नैण कपाट खुले घुघंट के ...
मनमोहना थांरी बाट जोऊं मै, छांड़ो नाहिं मोहि नैण जू अटके ...
तुम बिन खान पान नहीं सुझो ,बहोत उचाट जू मन क्यों भटके
तुम आयो सखू आज मिला है , अपणे पीया में मन है लटके
जाके संग जू प्रीत निकासी , छैल बिराणो मोरे नैनन मटके
जिनसूं सांची प्रीत "मुकन्दा', वो नर निरमल माणिक वट के......